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कश्मीर में पीडीपी गठबंधन से भाजपा के अलग होने के साथ वहां विपरीत राजनीतिक ध्रुवों के बीच हुई मेल-मिलाप की अच्छी शुरुआत का खत्म होना दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण हैं कश्मीर के हालात। वहां हालात 1989 जैसे हो चले हैं। इसका दोष किसी एक पर नहीं है। अगर रमजान के पवित्र महीने में संघर्षविराम के दौरान अमन का रुख न दिखाने के लिए आतंकी और अलगाववादी दोषी हैं तो वार्ता के लिए राजनीतिक पहल न कर पाने के लिए केंद्र सरकार भी कम दोषी नहीं है। अकर्मण्यता के इस गुनाह में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं और पाकिस्तान तो चाहता ही रहा है कि उसे साथ लिए बिना कश्मीर में कोई सरकार वार्ता शुरू करने में कामयाब न हो। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पीडीपी और भाजपा गठबंधन तो पहले ही बारूद के ढेर पर बैठा था जरूरत थी बस एक चिंगारी की और उसे लगाने का काम संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने कर दिया। भाजपा ने कश्मीर में अलगाववादियों की समर्थक समझी जाने वाली पीडीपी से गठबंधन बनाकर राजनीतिक उदारता का परिचय दिया था और महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसे अमन की पहल समझकर ही स्वीकार किया था।
मुफ्ती सईद से लेकर महबूबा तक सभी ने यह उम्मीद जताई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो व्यापक जनादेश मिला है, वे उसका सद्भावपूर्वक इस्तेमाल करके कश्मीर का दिल जीत लेंगे। दुर्भाग्य रहा कि मुफ्ती का 2016 में निधन हो गया और मोदी व महबूबा मिलकर कोई बड़ी पहल करने की बजाय भीतरी गांठों को ही खोलते रहे। कभी गोमांस, कभी अनुच्छेद 370 तो कभी अनुच्छेद 35 ए के बहाने गठबंधन में तनाव पैदा होता रहा। बुरहान बानी के मारे जाने के बाद तो जैसे कश्मीर के युवाओं पर हुर्रियत नेताओं और महबूबा की पार्टी का नियंत्रण ही जाता रहा। कठुआ की घटना से बने सांप्रदायिक माहौल ने तीन महीने तक पीडीपी और भाजपा के बीच जो खींचतान पैदा की वह भाजपा के नेताओं के लिए असह्य हो गई। कठुआ के साथ सख्त होती जा रही महबूबा के लिए ऑपरेशन ऑल आउट जैसी कार्रवाई को झेलना कठिन था। यही वजह है कि कश्मीर की कमान राज्यपाल के हाथों में है और एक बार फिर लोकतंत्र कश्मीर से दूर है।
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