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एक दशक से जारी कोशिशों के बीच दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा विक्रेता कंपनी ने 16 अरब डॉलर के सौदे के साथ भारतीय बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। वॉलमार्ट के करीब 500 अरब डॉलर के वैश्विक राजस्व आधार के हिसाब से देखें तो तेजी से बढ़ते भारतीय ऑनलाइन खुदरा बाजार में 55 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए चुकाई गई यह रकम छोटी ही लगती है। यह सौदा इस लिहाज से भी अहम है कि वॉलमार्ट की प्रतिद्वंद्वी कंपनी एमेजॉन ने भारतीय बाजार में छह साल पहले दस्तक दी थी लेकिन अभी तक वह दूसरे स्थान पर ही है। सच है कि इस सौदे ने वॉलमार्ट को फर्राटा शुरुआत दे दी है और मजबूत प्रतिद्वंद्वी का मुकाबला करने के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन भी हैं। अभी तक वित्त की कमी के चलते फ्लिपकार्ट को एमेजॉन का मुकाबला करने में समस्या हो रही थी। असली सवाल यह है कि इस सौदे से वॉलमार्ट को किस तरह के वास्तविक लाभ हुए हैं?
फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 16 अरब डॉलर का निवेश करने का मतलब है कि फ्लिपकार्ट का कुल मूल्य 21 अरब डॉलर आंका गया है जबकि एक साल पहले इसका मूल्य 10.5 अरब डॉलर था। एक साल के भीतर ही फ्लिपकार्ट के मूल्यांकन में इतनी अधिक बढ़ोतरी के पीछे वॉलमार्ट की भारतीय बाजार में प्रवेश और एमेजॉन की वैश्विक एकाधिकार को चुनौती देने की चाहत से जुड़ी कीमत भी शामिल है। हालांकि भारतीय खुदरा क्षेत्र की असलियत के बरअक्स इस प्रवेश रणनीति को परखने की जरूरत है। भारत का घरेलू ऑनलाइन खुदरा बाजार करीब 38.5 अरब डॉलर का है जो कुल खुदरा बाजार का महज पांच फीसदी ही है। फ्लिपकार्ट की बाजार हिस्सेदारी के हिसाब से देखें तो वॉलमार्ट ने भारतीय खुदरा बाजार का तीन फीसदी हिस्सा हासिल करने के लिए अच्छा-खासा प्रीमियम चुकाया है। ऐसा तब है जब भारतीय खुदरा बाजार दुनिया के शीर्ष दस में भी शामिल नहीं है।
वॉलमार्ट की चुनौती विरासत में मिले एक मसले से भी जुड़ी हुई है। पांच साल तक एमेजॉन के मुकाबले बढ़त बनाए रखने के बावजूद फ्लिपकार्ट 11 साल के अपने वजूद में मुनाफा कमाने में नाकाम रही है। पहले से ही घाटे में चल रही वॉलमार्ट ने भारत में मुनाफा कमाने की स्थिति में पहुंचने की न तो कोई समयसीमा तय की है और न ही यह बताया है कि वह कितना अतिरिक्त निवेश करेगी? संभव है कि दबदबा कायम करने की कोशिश में लगी वॉलमार्ट के लिए मुनाफा अधिक चिंता की बात नहीं होगी। लेकिन यह भी सही है कि खुदरा बाजार की प्रकृति बदल रही है और ऑनलाइन एवं भौतिक ढांचे के बीच सम्मिलन तेज हो रहा है। भारत में बिज़नेस-टू-कस्टमर (बी2सी) का भौतिक ढांचा तैयार कर पाना उसके लिए दूर की कौड़ी ही रहा है। वॉलमार्ट और दूसरी कंपनियां सरकार की अजीबोगरीब नीतियों की शिकार रही हैं जिसमें एकल एवं मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार को अलग-अलग देखा जाता रहा है। मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में केवल 51 फीसदी विदेशी निवेश की ही इजाजत रहने से हालात चुनौतीपूर्ण रहे हैं।
इस सौदे से कुछ घरेलू ऑनलाइन खुदरा कंपनियों के खत्म हो जाने की आशंका भारत में कारोबार करने से जुड़ी चुनौतियों की तरफ भी इशारा करती है। गत वर्षों में ई-कॉमर्स क्षेत्र अस्थिर नीतियों के घेरे में रहा है। घरेलू ई-कॉमर्स उद्यमियों का ठीक से ख्याल नहीं रखा जाता रहा। बहरहाल दो दिग्गज कंपनियों के बीच चलने वाली प्रतिस्पद्र्धा के चलते ग्राहकों को कुछ समय तक डिस्काउंट की भरमार देखने को मिलेगी। यह सौदा भारतीय स्टार्टअप के लिए शून्य से शुरुआत कर अरबों डॉलर का निवेश जुटाने और भारी राशि पर बेच देने का सफर भी बयां करता है। लेकिन फ्लिपकार्ट से बंसल दोस्तों का बाहर होना यह भी दर्शाता है कि उदीयमान भारतीय उद्यमी आखिर में हार मान लेते हैं।
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