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अनिल प्रकाश जोशी (पर्यावरणविद्)
कभी मौसम का इंतजार किया जाता था। किसी भी मौसम का। भीषण सर्दी-गरमी के कष्ट अपनी जगह रहते थे, लेकिन ये मौसम भी जो देते थे, उसे याद रखा जाता था। अब मौसम डराते हैं। किस तरह डराते हैं, यह पिछले एक सप्ताह में हमने देख लिया। देश के 13 राज्यों में आंधी-तूफान के डर ने सड़कों को खाली कर दिया, स्कूलों में छुट्टी की घोषणा कर दी गई और आपदा राहत की एजेंसियों को तैयार रहने के लिए कहा गया। यह डर किसी अफवाह की वजह से नहीं था। इससे पहले दो मई को जब उत्तर भारत में धूल भरी आंधी के साथ तूफान आया, तो 130 से भी ज्यादा लोगों की जान गई थी। दहशत का कारण यह आंकड़ा भी था, लेकिन आशंकाएं निराधार नहीं थीं।
मौसम विभाग भी इसकी लगातार चेतावनी दे रहा था। यह हाल अकेला भारत का नहीं है। मौसमी आपदाओं की अति दुनिया भर को परेशान करने लगी है। अमेरिका में हरीकेन ने टेक्सॉस व लूसियाना में पिछले वर्ष बड़ी तबाही मचाई थी, हजारों लोग बेघरबार हो गए थे। हाल ही में कैलिफोर्निया में बर्फीले तूफान ने बड़ा कहर ढाया। पर्यावरण बदलाव के साथ ही पूरी दुनिया में जो हो रहा है, उसे समझने की जरूरत है। सच यह है कि ये विभिन्न नामों के बवंडर प्रकृति से छेड़छाड़ का ही नतीजा हैं। पश्चिम एशिया और दक्षिण यूरोप में लूसीफर बवंडर उस बड़ी लू की ही देन था, जो इन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण चली थी।
हमें एक सरल सी बात समझ लेनी होगी कि तूफान तापक्रमों के अंतरों से पैदा होते और चलते हैं। मैदानों में उच्च तापमान और दूसरे इलाकों में निम्न तापमान का अंतर हवाओं का रुख बदलता है व उच्च तापमान के कारण रिक्तता को भरने के लिए हवाएं चलती हैं। जितना बड़ा यह अंतर होगा, उतना ही तेज तूफान व बवंडर होगा। हाल में ही आया बवंडर पाकिस्तान बॉर्डर के गांव नवाबशाह के उच्च तापमान के कारण बना था। वहां अप्रैल के अंत में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस पार कर गया था। इस तरह के तूफान को वैज्ञानिक भाषा में डाउन बस्र्ट भी कहते हैं और यही बवंडर राजस्थान, पंजाब व उत्तर प्रदेश में पहुंचने पर थंडर स्टॉर्म बना। इसी समय गरमी के कारण बंगाल की खाड़ी में उच्च तापक्रम में वाष्पोत्सर्जित हवा ने भी इस बवंडर का साथ दिया। यह पिछले 20 साल में सबसे बड़ा तूफान था।
दुनिया भर में घट रही ऐसी चरम मौसमी आपदाएं बड़े खतरों की ओर संकेत कर रही हैं। और इन सबके पीछे एक ही कारण है, धरती का बढ़ता तापमान। माना जाता है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो इस सदी के अंत तक तापक्रम में नौ डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ोतरी हो जाएगी। डर यह है कि शायद उसके बाद वापसी असंभव होगी। इस बदलाव में एक बड़ा कारण वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का बढ़ता घनत्व भी है। अब दुनिया के सबसे बड़े देश अमेरिका को ही लीजिए, जहां वर्ष 1981 से 2016 के बीच में तापक्रम 1.8 डिग्री फारेनहाइट बढ़ा है। इस देश में टॉरनेडो से लेकर बर्फीले तूफान व बाढ़ ने पिछले कुछ दशकों से तबाही मचा रखी है। बढ़ता तापक्रम मात्र बवंडरों को जन्म नहीं दे रहा है, बल्कि इससे समुद्री तल में वर्ष 1880 के बाद से लगातार बढ़ोतरी हुई है। लगभग आठ इंच तक यह तल बढ़ चुका है। सब कुछ ऐसा ही रहा, तो वर्ष 2100 तक के अंत तक यह एक से चार फीट तक बढ़ जाएगा, क्योंकि ग्लेशियर पहाड़ों से चलकर समुद्र में पिघलते हुए पहुंच जाएंगे और समुद्रों में उच्च ज्वार-भाटा व समुद्री तूफान की आवृत्ति बढ़ जाएगी।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार, 1895 से आज तक सबसे ज्यादा गरम वर्ष दुनिया में 2016 ही रहा है। यही वह साल था, जब सभी तरह की त्रासदियों ने दुनिया को घेरा था। बढ़ते तापक्रम व जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अनायास अंतर भी देखा जा रहा है और कभी अचानक तापमान का गिर जाना या मानसून का एहसास दिला जाना, इसी से जुड़ा है। धरती के बढ़ते तापक्रम का एक और पहलू है और वह है बज्रपात, यानी बिजली का गिरना। एक अध्ययन के अनुसार, अगर यही चलन रहा, तो इस सदी के अंत तक बज्रपात की रफ्तार 50 फीसदी बढ़ जाएगी, क्योंकि हर एक डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर बिजली गिरने की रफ्तार 12 फीसदी बढ़ जाती है।
बदलते जलवायु व तापमान को तूफान तक ही सीमित नहीं समझा जाना चाहिए, यह बर्फ पिघलने का भी सबसे बड़ा कारण बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1960 से 2015 तक उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया में जहां एक तरफ तेज रफ्तार से बर्फ पिघली है, तो वहीं दूसरी तरफ ऊंचे इलाकों में बर्फ जमने में लगभग 10 फीसदी की कमी आई है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा असर इस रूप में भी सामने आया है कि पहाड़ों में बर्फ पड़ने के समय में भी एक बड़ा अंतर आ चुका है। हिमालय में बर्फ गिरने का उचित समय नवंबर-दिसंबर ही होना चाहिए, ताकि उसे जमने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। जबकि जनवरी-फरवरी में पड़ी हुई बर्फ तत्काल पिघल जाती है। इस घटना को सरलता से नहीं लिया जा सकता, क्योंकि जहां एक तरफ बर्फ जमने में संकट आ चुका है, वहीं बढ़ते तापक्रम के कारण हिमखंडों के पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है और यह पूरी दुनिया में हो रहा है।
इन सब घटनाओं के शुरुआती संकेत 18वीं शताब्दी से ही मिलने शुरू हो गए थे, जब दुनिया में औद्योगिक क्रांति का जन्म हुआ। इसके ही बाद हम विकास के एक वीभत्स चक्रव्यूह में फंसते चले गए। आज हालात ये हैं कि कभी बवंडरों से या फिर बाढ़ से या फिर शीतलहर से दुबके पड़े हैं। इससे मुक्त होने का रास्ता अगर कहीं है, तो इन घटनाओं को समझने और इन पर सोचने का है, ताकि इससे निपटने की रणनीति तैयार की जा सके। वरना कभी एक बड़ा तूफान हमारे सामने खड़ा होगा।
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